Bhakti ras ka udaharan हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में सबसे अधिक मिलते हैं। जब किसी कविता में भक्त अपने प्रभु के प्रति प्रेम, श्रद्धा, विनय और पूरा समर्पण प्रकट करे, स्वयं को छोटा और प्रभु को महान माने, तो पढ़ने वाले का मन भी श्रद्धा से भर जाता है। वहीं भक्ति रस होता है। यह रस के ग्यारह प्रकारों में ग्यारहवाँ है।
भक्ति रस की परिभाषा (Bhakti ras ki paribhasha)
ईश्वर के प्रति हृदय में स्थित प्रेम, जिसे अनुराग या भगवद् विषयक रति कहते हैं, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो भक्ति रस कहलाता है।
भक्ति रस का स्थायी भाव: अनुराग (ईश्वर विषयक रति)। कुछ पुस्तकें इसे "भगवद् रति" या "देव विषयक रति" भी लिखती हैं।
भक्ति को अलग रस क्यों माना गया
प्राचीन आचार्य ईश्वर के प्रति प्रेम को "भाव" मानते थे, पूरा रस नहीं। भक्तिकाल में जब सूरदास, तुलसीदास, कबीर, मीराबाई, रैदास जैसे संत कवियों ने भक्ति की अपार कविताएँ रचीं, तो आचार्य रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिंधु में भक्ति को स्वतंत्र रस के रूप में स्थापित किया। आज अधिकतर स्कूली पुस्तकें इसे ग्यारहवाँ रस मानती हैं।
भक्त कवियों के बहुत से पदों में आराध्य का नाम सीधे आता है। इस पेज पर हम ऐसे उदाहरण ले रहे हैं जिनमें प्रभु के प्रति भक्ति का सामान्य भाव है, ताकि रस की पहचान साफ़ समझ आए।
भक्ति रस के अंग
| अंग | भक्ति रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | अनुराग (ईश्वर विषयक रति) |
| आश्रय | भक्त |
| आलंबन | ईश्वर, प्रभु, परमात्मा |
| उद्दीपन | प्रभु के गुण, सत्संग, भजन कीर्तन, मंदिर, संतों की वाणी, प्रभु की कृपा का स्मरण |
| अनुभाव | हाथ जोड़ना, सिर झुकाना, आँसू बहाना, गुणगान करना, नाचना गाना, रोमांच |
| संचारी भाव | हर्ष, विनय (दैन्य), धृति, स्मृति, औत्सुक्य, निर्वेद |
भक्ति रस की पहचान
- पंक्ति में प्रभु, साईं, स्वामी, नाथ, शरण, चरण, कृपा, भजन जैसे शब्द हों।
- भक्त स्वयं को छोटा, दास या सेवक और ईश्वर को महान बताए।
- मन में श्रद्धा, विनय और समर्पण जागे।
- केवल संसार से विरक्ति हो, ईश्वर से प्रेम न हो, तो वह शांत रस होगा।
भक्ति रस के उदाहरण (Bhakti ras ke udaharan)
उदाहरण 1: रैदास
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अँग अँग बास समानी॥
व्याख्या: संत रैदास कहते हैं: हे प्रभु, तुम चंदन हो और हम पानी, जिसके अंग अंग में चंदन की सुगंध समा गई है। भक्त स्वयं को प्रभु से अलग नहीं मानता, उनके प्रेम में पूरी तरह घुल गया है। रैदास आश्रय हैं, प्रभु आलंबन हैं, उनकी महिमा उद्दीपन है। यह पद कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में भी है।
उदाहरण 2: रैदास
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥
व्याख्या: हे प्रभु, तुम दीपक हो और मैं उसकी बाती, जिसकी ज्योति दिन रात जलती रहती है। भक्त का जीवन प्रभु के प्रकाश से ही रोशन है। यहाँ रूपक अलंकार के सहारे भक्ति का भाव व्यक्त हुआ है।
उदाहरण 3: कबीर
मोकों कहाँ ढूँढ़े बंदे, मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मस्जिद॥
व्याख्या: कबीर के इस पद में प्रभु स्वयं कहते हैं: हे मनुष्य, तू मुझे कहाँ ढूँढ़ता है, मैं तो तेरे पास ही हूँ, न मंदिर में हूँ न मस्जिद में। भीतर बसे परमात्मा के प्रति प्रेम और विश्वास भक्ति रस जगाता है।
उदाहरण 4: मौलिक उदाहरण
उदाहरण:
हाथ जोड़कर खड़ा हूँ स्वामी, द्वार तुम्हारे आज।
मैं तो निर्बल, तुम सब समरथ, रख लेना मेरी लाज॥
व्याख्या: हाथ जोड़ना अनुभाव है, स्वयं को निर्बल और प्रभु को समर्थ कहना दैन्य (विनय) संचारी भाव है। शरण में आने का भाव भक्ति रस का मूल है।
उदाहरण 5: मौलिक उदाहरण (प्रकृति में प्रभु)
उदाहरण:
फूल फूल में रंग तुम्हारा, पत्ती पत्ती गान।
कण कण में बसते हो प्रभु जी, कैसे करूँ बखान॥
व्याख्या: भक्त को प्रकृति के हर कण में प्रभु दिखते हैं। प्रभु के गुणों का बखान अनुभाव है, हर्ष और औत्सुक्य संचारी भाव हैं। "फूल फूल", "पत्ती पत्ती" में पुनरुक्ति की सुंदरता है।
उदाहरण 6: मौलिक उदाहरण (भजन)
उदाहरण:
साँझ भई, दीया जल आया, गूँजे मीठे भजन।
आँखें भीगीं, मन भर आया, चरणों में सब अर्पण॥
व्याख्या: साँझ का दीया और भजन उद्दीपन हैं, आँखें भीगना सात्त्विक अनुभाव है, सब कुछ अर्पण कर देना पूर्ण समर्पण है।
भक्ति रस, शांत रस और श्रृंगार रस में अंतर
| रस | स्थायी भाव | प्रेम या भाव किसके प्रति |
|---|---|---|
| भक्ति | अनुराग | ईश्वर के प्रति |
| शांत | निर्वेद | संसार से विरक्ति, किसी के प्रति प्रेम नहीं |
| श्रृंगार | रति | नायक नायिका के बीच |
| वात्सल्य | वत्सलता | संतान के प्रति |
परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी" में कौन सा रस है? उत्तर: भक्ति रस। स्थायी भाव: अनुराग (ईश्वर विषयक रति)। आश्रय: भक्त कवि रैदास। आलंबन: प्रभु। उद्दीपन: प्रभु की महिमा और उनका सान्निध्य। अनुभाव: प्रभु से एकाकार होने का भाव प्रकट करना। संचारी भाव: हर्ष, विनय, धृति।
याद रखने की ट्रिक
"प्रेम प्रिया से तो श्रृंगार, बच्चे से तो वात्सल्य, प्रभु से तो भक्ति।" तीनों रसों की जड़ में प्रेम है, बस प्रेम का पात्र बदल जाता है। ईश्वर के पर्यायवाची (प्रभु, परमात्मा, जगदीश्वर) दिखें, तो भक्ति रस की जाँच करें।
सामान्य गलतियाँ
- हर संत वाणी भक्ति रस नहीं होती। कबीर के नश्वरता वाले दोहे शांत रस के हैं।
- कुछ पुरानी पुस्तकें भक्ति को अलग रस नहीं मानतीं और इसे शांत रस में गिनती हैं। अपनी पाठ्यपुस्तक के अनुसार उत्तर दें।
- स्थायी भाव "भक्ति" नहीं, अनुराग या ईश्वर विषयक रति लिखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भक्ति रस की परिभाषा क्या है?
ईश्वर के प्रति हृदय में स्थित अनुराग जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो भक्ति रस बनता है। इसमें भक्त प्रभु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण प्रकट करता है।
भक्ति रस का स्थायी भाव क्या है?
भक्ति रस का स्थायी भाव अनुराग है, जिसे ईश्वर विषयक रति या भगवद् रति भी कहते हैं।
भक्ति रस का प्रसिद्ध उदाहरण कौन सा है?
रैदास का पद "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अँग अँग बास समानी॥" भक्ति रस का प्रसिद्ध उदाहरण है। इसमें भक्त प्रभु के प्रेम में पूरी तरह घुल गया है।
भक्ति रस को अलग रस किसने माना?
आचार्य रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृतसिंधु में भक्ति को स्वतंत्र रस के रूप में स्थापित किया। इससे पहले इसे केवल भाव माना जाता था।
भक्ति रस और शांत रस में क्या अंतर है?
भक्ति रस में ईश्वर के प्रति प्रेम (अनुराग) होता है। शांत रस में संसार की नश्वरता से वैराग्य (निर्वेद) होता है, उसमें किसी के प्रति प्रेम आवश्यक नहीं।