Rupak alankar में तुलना इतनी गहरी हो जाती है कि दोनों वस्तुएँ एक बन जाती हैं। उपमा में हम कहते हैं "मुख चंद्रमा के समान है", पर रूपक में सीधे कहते हैं "मुख-चंद्र" या "मुख ही चंद्रमा है"। रूप का अर्थ है आकार, यानी उपमेय को उपमान का रूप दे दिया जाता है।
रूपक अलंकार की परिभाषा
Rupak alankar ki paribhasha: जहाँ अत्यधिक समानता के कारण उपमेय और उपमान में कोई अंतर न रह जाए और उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप कर दिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। यह अलंकार के अर्थालंकार भेद में आता है।
अभेद का अर्थ है भेद न होना। रूपक में कवि यह नहीं कहता कि दोनों मिलते जुलते हैं, वह कहता है कि दोनों एक ही हैं।
रूपक अलंकार की पहचान
- सा, सी, सम, समान जैसे वाचक शब्द नहीं होते।
- उपमेय और उपमान प्रायः योजक चिह्न से जुड़े होते हैं, जैसे मुख-चंद्र, चरण-कमल, ज्ञान-दीप।
- कभी "रूपी" शब्द आता है, जैसे शिक्षा रूपी दीपक।
- कभी सीधे "है" लगाकर कहा जाता है, जैसे गुरु कुम्हार है, शिष्य घड़ा है।
रूपक अलंकार के भेद
| भेद | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| सांग रूपक | उपमेय के अंगों पर भी उपमान के अंगों का आरोप | संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार |
| निरंग रूपक | केवल उपमेय पर उपमान का आरोप, अंगों का नहीं | मैया मैं तौ चंद खिलौना लैहौं |
| परंपरित रूपक | एक आरोप दूसरे आरोप का कारण बने | उदाहरण: विद्या रूपी जल से मन रूपी खेत हरा हो गया। |
स्कूली परीक्षा में प्रायः भेद नहीं पूछे जाते, केवल रूपक की पहचान पूछी जाती है।
रूपक अलंकार के उदाहरण
Rupak alankar ke udaharan अर्थ सहित नीचे दिए गए हैं।
- संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार। (तुलसीदास)
संत को हंस, गुण को दूध और विकार को पानी मान लिया गया है। अंगों सहित आरोप है, इसलिए सांग रूपक है। - माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पड़ंत। (कबीर)
माया को दीपक और मनुष्य को पतंगा मान लिया गया है, जो घूम घूमकर उसमें गिरता है। - गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट। (कबीर)
गुरु को कुम्हार और शिष्य को घड़ा कहा गया है। कोई वाचक शब्द नहीं है, इसलिए रूपक है। - बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। (कबीर)
विरह को ही भुवंगम (साँप) मान लिया गया है, जिस पर कोई मंत्र असर नहीं करता। - मैया मैं तौ चंद खिलौना लैहौं। (सूरदास)
बालक चंद्रमा को ही खिलौना मानकर माँगता है, इसलिए चंद-खिलौना में रूपक है। - उदाहरण: माँ ने ज्ञान-दीप जलाकर मेरे मन का अँधेरा दूर किया। (स्वरचित उदाहरण)
ज्ञान को दीपक और अज्ञान को अँधेरा मान लिया गया है। - उदाहरण: बालक का मुख-चंद्र देखकर सारा घर खिल उठा। (स्वरचित उदाहरण)
मुख को ही चंद्रमा मान लिया गया है। - उदाहरण: विदा के समय आँसुओं की बरसात थमने का नाम नहीं ले रही थी। (स्वरचित उदाहरण)
आँसुओं को ही बरसात मान लिया गया है। - उदाहरण: जीवन एक नदी है, जो कभी रुकती नहीं। (स्वरचित उदाहरण)
जीवन को सीधे नदी कहा गया है, समान या सा जैसा कोई शब्द नहीं है।
उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा में अंतर
| अलंकार | मूल भाव | वाचक शब्द | एक ही बात तीन ढंग से |
|---|---|---|---|
| उपमा | समानता (दोनों अलग, पर मिलते जुलते) | सा, सी, से, सम, समान, सरिस, जैसा | मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। |
| रूपक | अभेद (दोनों एक ही मान लिए गए) | कोई वाचक नहीं, कभी रूपी या योजक चिह्न | मुख चंद्रमा है। / मुख-चंद्र चमक रहा है। |
| उत्प्रेक्षा | संभावना (ऐसा लगता है मानो) | मनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ, जनहुँ | मुख मानो चंद्रमा है। |
जाँचने का आसान तरीका: वाक्य में "के समान" जोड़कर देखिए। यदि वाक्य पहले से "के समान" कह रहा है तो उपमा, यदि "मानो" कह रहा है तो उत्प्रेक्षा, और यदि दोनों को सीधे एक बता रहा है तो रूपक।
रूपक और कर्मधारय समास
मुख-चंद्र, चरण-कमल, ज्ञान-दीप जैसे शब्द व्याकरण में कर्मधारय समास के भी उदाहरण हैं। समास में हम शब्द का विग्रह करते हैं (चंद्र रूपी मुख), जबकि अलंकार में हम कविता का सौंदर्य देखते हैं। प्रश्न किस विषय से है, यह देखकर उत्तर दें।
परीक्षा में रूपक का उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "गुरु कुम्हार सिष कुंभ है" में कौन सा अलंकार है?
आदर्श उत्तर: इसमें रूपक अलंकार है, क्योंकि गुरु (उपमेय) पर कुम्हार (उपमान) का और शिष्य (उपमेय) पर कुंभ यानी घड़े (उपमान) का अभेद आरोप किया गया है। यहाँ सा, सम या समान जैसा कोई वाचक शब्द नहीं है। कबीर कहते हैं कि जैसे कुम्हार अंदर से हाथ का सहारा देकर बाहर से चोट मारता है और घड़े को सुडौल बनाता है, वैसे ही गुरु शिष्य के दोष दूर करता है।
रूपक के उत्तर में "अभेद आरोप" और "वाचक शब्द नहीं है" ये दो बातें ज़रूर लिखें, क्योंकि यही रूपक को उपमा से अलग करती हैं।
याद रखने की ट्रिक
"रूपक में रूप बदलता है।" उपमेय उपमान का रूप ले लेता है, बीच में कोई सा, सी या समान नहीं रहता।
सामान्य गलतियाँ
- "कमल जैसे चरण" को रूपक लिखना। यहाँ जैसे वाचक है, इसलिए उपमा है।
- हर योजक चिह्न वाले शब्द को रूपक मानना। "माता-पिता" में कोई आरोप नहीं है, यह द्वंद्व है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रूपक अलंकार किसे कहते हैं?
जहाँ उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप हो, यानी दोनों को एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें वाचक शब्द नहीं होता। जैसे मुख-चंद्र, ज्ञान-दीप।
रूपक अलंकार के 10 उदाहरण बताइए।
संत हंस गुन गहहिं पय, माया दीपक नर पतंग, गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, बिरह भुवंगम तन बसै, मैया मैं तौ चंद खिलौना लैहौं प्रसिद्ध उदाहरण हैं। मुख-चंद्र, ज्ञान-दीप, आँसुओं की बरसात, जीवन एक नदी है और शिक्षा रूपी दीपक भी रूपक के सरल उदाहरण हैं।
रूपक अलंकार की पहचान कैसे करें?
रूपक में सा, सी, समान जैसे वाचक शब्द नहीं होते। उपमेय और उपमान प्रायः योजक चिह्न से जुड़े होते हैं या रूपी शब्द से जुड़ते हैं। दोनों को एक ही वस्तु मान लिया जाता है।
रूपक अलंकार के कितने भेद हैं?
रूपक के तीन मुख्य भेद हैं: सांग रूपक, निरंग रूपक और परंपरित रूपक। स्कूली परीक्षा में प्रायः केवल रूपक की पहचान पूछी जाती है।
उपमा और रूपक में क्या अंतर है?
उपमा में दोनों वस्तुएँ अलग रहती हैं और उनकी समानता बताई जाती है। रूपक में दोनों को एक मान लिया जाता है। मुख चंद्रमा के समान है उपमा है, मुख-चंद्र रूपक है।