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शब्द और व्याकरण

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समास

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अलंकार, रस, छंद

Anupras alankarYamak alankarShlesh alankarUpma alankarRupak alankarUtpreksha alankarAtishyokti alankarManvikaran alankarBhrantiman alankarSandeh alankarAlankarShringar rasHasya rasKarun rasRaudra rasVeer rasBhayanak rasVibhats rasAdbhut rasShant rasVatsalya rasBhakti rasRasDohaChhand

दोहा (Hindi Doha): परिभाषा, मात्रा और प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित

दोहा दो पंक्तियों और चार चरणों वाला मात्रिक छंद है, जिसके विषम चरणों में 13 और सम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं।

  • अलंकार, रस, छंद
  • अपडेट: 11 Oct 2026

Hindi doha (हिंदी दोहा) दो पंक्तियों और चार चरणों वाला एक मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। कबीर, रहीम, तुलसीदास और बिहारी के दोहे सैकड़ों वर्षों से लोगों की ज़ुबान पर हैं, क्योंकि कम शब्दों में बड़ी सीख देना दोहे की सबसे बड़ी खूबी है।

दोहा किसे कहते हैं (Doha in hindi)

दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद है। "मात्रिक" इसलिए क्योंकि इसमें मात्राएँ गिनी जाती हैं, और "अर्धसम" इसलिए क्योंकि इसके आधे चरण (पहला और तीसरा) आपस में बराबर हैं, और बाकी आधे (दूसरा और चौथा) आपस में बराबर हैं। छंद के नियमों में दोहा सबसे सरल और सबसे लोकप्रिय छंद माना जाता है।

दोहे का नियमविवरण
पंक्तियाँ (दल)2
चरण4 (हर पंक्ति में 2)
विषम चरण (पहला, तीसरा)13 मात्राएँ
सम चरण (दूसरा, चौथा)11 मात्राएँ
एक पंक्ति में कुल24 मात्राएँ, 13 के बाद यति (रुकाव)
सम चरण का अंतगुरु-लघु (ऽ।) और आपस में तुक

दोहे में मात्रा कैसे गिनें

मात्रा गिनने के दो सरल नियम हैं: छोटे स्वर (अ, इ, उ, ऋ) वाले वर्ण की 1 मात्रा (लघु, ।), और लंबे स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) वाले वर्ण की 2 मात्राएँ (गुरु, ऽ)। अनुस्वार वाला वर्ण गुरु होता है, आधा अक्षर अलग से नहीं गिना जाता, और संयुक्त अक्षर से पहले का लघु वर्ण गुरु बन जाता है। स्वरों की मात्राओं का चार्ट देखकर अभ्यास करें।

अब कबीर के एक प्रसिद्ध दोहे की गिनती देखिए:

चरणमात्रा गिनतीकुल
बड़ा हुआ तो क्या हुआब(1) ड़ा(2) हु(1) आ(2) तो(2) क्या(2) हु(1) आ(2)13
जैसे पेड़ खजूरजै(2) से(2) पे(2) ड़(1) ख(1) जू(2) र(1)11
पंथी को छाया नहींपं(2) थी(2) को(2) छा(2) या(2) न(1) हीं(2)13
फल लागे अति दूरफ(1) ल(1) ला(2) गे(2) अ(1) ति(1) दू(2) र(1)11

दूसरे और चौथे चरण "खजूर" और "दूर" पर खत्म होते हैं: दोनों के अंत में गुरु-लघु (जू-र, दू-र) है और दोनों में तुक भी मिलती है। यही दोहे की पक्की पहचान है। ध्यान दें: पुराने दोहों में कभी-कभी गाते समय किसी गुरु को लघु की तरह पढ़ा जाता है, इसलिए कुछ दोहों में लिखी गिनती में एक मात्रा का अंतर दिख सकता है।

कबीर के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित

कबीरदास भक्तिकाल के संत कवि थे। उनके दोहों को साखी भी कहा जाता है। ये सीधी, बोलचाल की भाषा में जीवन की सच्ची सीख देते हैं। (पुस्तकों में दोहों के पाठ में थोड़ा अंतर मिल सकता है।)

1. बुरा जो देखन मैं चला

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

अर्थ: जब मैं दुनिया में बुरे व्यक्ति को खोजने निकला, तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। जब मैंने अपने मन के भीतर झाँककर देखा, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है। सीख: दूसरों में दोष ढूँढने से पहले अपने दोष देखो।

2. ऐसी बानी बोलिए

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

अर्थ: हमें ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिसमें घमंड न हो। मीठी वाणी सुनने वाले को शांति देती है और बोलने वाले का मन भी शांत रहता है। (यह दोहा "ऐसी वाणी बोलिए" के रूप में भी प्रसिद्ध है।)

3. काल करे सो आज कर

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

अर्थ: जो काम कल करना है, उसे आज करो, और जो आज करना है, उसे अभी करो। पल भर में कुछ भी हो सकता है, फिर वह काम कब करोगे। सीख: काम को टालना नहीं चाहिए।

4. बड़ा हुआ तो क्या हुआ

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

अर्थ: केवल बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर न राही को छाया देता है और उसके फल भी बहुत ऊँचाई पर लगते हैं। सीख: बड़प्पन दूसरों के काम आने में है।

5. पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

अर्थ: मोटी-मोटी किताबें पढ़कर भी कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाया। जो प्रेम के ढाई अक्षर समझ ले, वही सच्चा ज्ञानी है। सीख: ज्ञान के साथ प्रेम और दया भी ज़रूरी है।

6. धीरे-धीरे रे मना

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

अर्थ: हे मन, धैर्य रखो, हर काम धीरे-धीरे ही होता है। माली पेड़ को सौ घड़े पानी से एक दिन में सींच दे, तब भी फल अपनी ऋतु आने पर ही लगेंगे। सीख: धैर्य रखो, मेहनत का फल समय पर मिलता है।

रहीम के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित

अब्दुल रहीम खानखाना (रहीम) अपने नीति के दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके दोहों में दोस्ती, प्रेम और व्यवहार की सीख मिलती है।

7. रहिमन धागा प्रेम का

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥

अर्थ: प्रेम का रिश्ता एक नाज़ुक धागे जैसा है, इसे झटके से मत तोड़ो। टूटा धागा फिर से पहले जैसा नहीं जुड़ता, और जुड़ भी जाए तो बीच में गाँठ पड़ जाती है। सीख: रिश्तों को सँभालकर रखो।

8. रहिमन देखि बड़ेन को

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि॥

अर्थ: बड़ी चीज़ों को देखकर छोटी चीज़ों को फेंक नहीं देना चाहिए। जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती। सीख: हर व्यक्ति और हर चीज़ का अपना महत्व है।

दोहा और सोरठा में अंतर

दोहासोरठा
विषम चरण 13, सम चरण 11 मात्राएँ।विषम चरण 11, सम चरण 13 मात्राएँ।
तुक सम चरणों (दूसरे, चौथे) के अंत में।तुक विषम चरणों (पहले, तीसरे) के अंत में।
यति 13 मात्रा पर।यति 11 मात्रा पर।

किसी दोहे के दोनों चरणों की जगह बदल दें, तो वह सोरठा जैसा बन जाता है। इसीलिए सोरठा को "उलटा दोहा" भी कहा जाता है।

दोहे पढ़ने और याद करने की ट्रिक

  • पहले दोहे को ज़ोर से लय में पढ़िए और 13 मात्रा के बाद रुकिए। लय अपने आप पहचान में आने लगेगी।
  • हर दोहे की एक पंक्ति की "सीख" अपने शब्दों में लिखिए, परीक्षा में भावार्थ लिखना आसान होगा।
  • दोहों में अनुप्रास और उपमा जैसे अलंकार खोजिए, जैसे "पोथी पढ़ि पढ़ि" में प वर्ण की आवृत्ति।
  • दोहों में आने वाले पुराने शब्दों के अर्थ याद रखिए: कोय (कोई), आखर (अक्षर), पंथी (राही), बहुरि (फिर), तरवारि (तलवार)।

दोहे में भाव की दृष्टि से अधिकतर शांत रस मिलता है, क्योंकि कबीर और रहीम के दोहे मन को शांति और सही राह देने वाली सीख देते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दोहा किसे कहते हैं?

दोहा दो पंक्तियों और चार चरणों वाला अर्धसम मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु और तुक होती है।

दोहे में कितनी मात्राएँ होती हैं?

दोहे की हर पंक्ति में 24 मात्राएँ होती हैं, जो 13 और 11 में बँटी होती हैं। पूरे दोहे में दो पंक्तियाँ होती हैं, इसलिए कुल 48 मात्राएँ होती हैं।

बुरा जो देखन मैं चला दोहे का अर्थ क्या है?

कबीर कहते हैं कि जब वे दुनिया में बुरे व्यक्ति को खोजने निकले तो कोई बुरा नहीं मिला। जब उन्होंने अपने मन को देखा तो पाया कि उनसे बुरा कोई नहीं है। सीख यह है कि दूसरों के दोष देखने से पहले अपने दोष सुधारो।

ऐसी वाणी बोलिए दोहे का अर्थ क्या है?

कबीर कहते हैं कि हमें घमंड छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वाले को शीतलता और शांति दे। ऐसी वाणी से बोलने वाले का मन भी शांत रहता है।

हिंदी में दोहे का उदाहरण दीजिए।

कबीर का दोहा: काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥ इसका अर्थ है कि काम को टालना नहीं चाहिए। इसके पहले चरण में 13 और दूसरे चरण में 11 मात्राएँ हैं।