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अलंकार, रस, छंद

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रौद्र रस (Raudra Ras): परिभाषा, स्थायी भाव और उदाहरण

जहाँ शत्रु, अपमान या अन्याय के कारण हृदय में क्रोध जागकर पुष्ट हो, वहाँ रौद्र रस होता है। इसका स्थायी भाव क्रोध है।

  • अलंकार, रस, छंद
  • अपडेट: 11 Oct 2026

Raudra ras ka udaharan पहचानने के लिए एक बात याद रखिए: रौद्र रस गुस्से का रस है। जब किसी कविता में किसी पात्र का अपमान, अन्याय, शत्रु की ललकार या अपने प्रिय के प्रति अपशब्द सुनकर ऐसा क्रोध भड़कता है कि आँखें लाल हो जाएँ, होंठ फड़कने लगें और हाथ हथियार की ओर बढ़ें, तो वहाँ रौद्र रस होता है। यह रस के नौ मूल भेदों में चौथा है।

रौद्र रस की परिभाषा (Raudra ras ki paribhasha)

विरोधी पक्ष द्वारा किए गए अपमान, अनुचित व्यवहार या अन्याय के कारण हृदय में स्थित क्रोध नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो वहाँ रौद्र रस की निष्पत्ति होती है।

रौद्र रस का स्थायी भाव: क्रोध।

रौद्र रस के अंग

अंगरौद्र रस में
स्थायी भावक्रोध
आलंबनशत्रु, अपमान करने वाला, अन्यायी, दुराचारी व्यक्ति
उद्दीपनशत्रु के कठोर वचन, ललकार, उसका घमंड, उसके अत्याचार
अनुभावआँखें लाल होना, भौंहें तनना, होंठ चबाना, दाँत पीसना, गरजना, हथियार उठाना, शरीर काँपना
संचारी भावउग्रता, अमर्ष, आवेग, गर्व, चपलता, स्मृति

रौद्र रस की पहचान

  • पंक्ति में क्रोध, रोष, रिस, कोप, आग बबूला, लाल आँखें, दाँत पीसना जैसे शब्द या चेष्टाएँ हों।
  • किसी व्यक्ति के अपमान या अन्याय से भड़का गुस्सा दिखे।
  • बदला लेने या दंड देने की धमकी हो।
  • हिंदी के कई मुहावरे रौद्र भाव बताते हैं, जैसे खून खौलना, लाल पीला होना, आपे से बाहर होना।

रौद्र रस के उदाहरण (Raudra ras ke udaharan)

उदाहरण 1: तुलसीदास (धनुष भंग के बाद का संवाद)

बालकु बोलि बधौं नहि तोही।
केवल मुनि जड़ मोहि बिलोकही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही।
बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही॥

व्याख्या: धनुष टूटने से क्रोधित मुनि राजकुमार से कहते हैं कि मैं तुझे बालक समझकर नहीं मार रहा, तू मुझे केवल मुनि समझता है। मैं बाल ब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी हूँ, सारा संसार जानता है कि मैं क्षत्रिय कुल का शत्रु हूँ। राजकुमार के व्यंग्य भरे वचन उद्दीपन हैं, धमकी भरी वाणी अनुभाव है, गर्व और उग्रता संचारी भाव हैं। यह अंश कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में है।

उदाहरण 2: तुलसीदास (धनुष भंग के बाद का संवाद)

भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही।
बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा।
परसु बिलोकु महीपकुमारा॥

व्याख्या: मुनि गरजकर कहते हैं कि मैंने अपनी भुजाओं के बल से पृथ्वी को कई बार राजाओं से रहित करके ब्राह्मणों को दान दे दिया। हे राजकुमार, सहस्रबाहु की भुजाएँ काटने वाले मेरे इस फरसे को देख। फरसा दिखाना और अपनी शक्ति का बखान करना क्रोध के अनुभाव हैं।

उदाहरण 3: तुलसीदास (दोहा)

मातु पितहि जनि सोचबस, करसि महीपकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन, परसु मोर अति घोर॥

व्याख्या: हे राजकिशोर, अपने माता पिता को चिंता में मत डाल। मेरा फरसा इतना भयंकर है कि गर्भ के बच्चों तक का नाश कर देता है। यहाँ क्रोध से भरी चेतावनी है, इसलिए रौद्र रस है।

उदाहरण 4: मौलिक उदाहरण

उदाहरण:
सुनकर माँ का अपमान, भुजा फड़कने लगी।
आँखें हुईं अंगार, साँस धधकने लगी॥
दाँत पीसकर बोला, "अब न सहूँगा और।"
काँप उठा सारा आँगन, ऐसा उठा था शोर॥

व्याख्या: माँ का अपमान उद्दीपन है। भुजा फड़कना, आँखें अंगार होना, दाँत पीसना और गरजना अनुभाव हैं। अमर्ष और आवेग संचारी भाव हैं।

उदाहरण 5: मौलिक उदाहरण (गाँव)

उदाहरण:
जब देखा उसने खेत उजाड़े, लूटी सबकी धान।
लाठी लेकर गरजा मुखिया, "आज बचे न प्रान।"

व्याख्या: लुटेरे आलंबन हैं, उजड़े खेत उद्दीपन हैं, लाठी उठाना और गरजना अनुभाव हैं। अन्याय पर भड़का क्रोध रौद्र रस बनाता है।

उदाहरण 6: मौलिक उदाहरण (प्रकृति की उपमा)

उदाहरण:
भौंहें तनीं कमान सी, मुख हो गया लाल।
शत्रु की ललकार सुनी, जागा क्रोध कराल॥

व्याख्या: भौंहें तनना और मुख लाल होना क्रोध के अनुभाव हैं। "भौंहें तनीं कमान सी" में उपमा अलंकार भी है।

रौद्र रस और वीर रस में अंतर

विद्यार्थी अक्सर रौद्र और वीर रस में भ्रमित हो जाते हैं, क्योंकि दोनों में शत्रु होता है।

रौद्र रसवीर रस
स्थायी भाव क्रोधस्थायी भाव उत्साह
विवेक कम, बदले की आग अधिकविवेक और कर्तव्य बना रहता है
आँखें लाल, दाँत पीसना, काँपनाभुजाएँ फड़कना, आगे बढ़ना, ललकारना
लक्ष्य: अपमान करने वाले को दंडलक्ष्य: विजय, रक्षा या धर्म

परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें

प्रश्न: "बालकु बोलि बधौं नहि तोही" में कौन सा रस है? उत्तर: रौद्र रस। स्थायी भाव: क्रोध। आश्रय: मुनि। आलंबन: राजकुमार। उद्दीपन: राजकुमार के व्यंग्य वचन। अनुभाव: गरजना, फरसा दिखाना, धमकी देना। संचारी भाव: उग्रता, गर्व, अमर्ष।

अभ्यास: रस पहचानिए

  1. "सुनते ही अपमान के बोल, नथुने फूले, आँखें लाल।" उत्तर: रौद्र रस, क्योंकि अपमान से क्रोध जागा है और आँखें लाल होना उसका अनुभाव है।
  2. "रणभेरी सुन वीर चले, मन में भरा उमंग।" उत्तर: वीर रस, क्योंकि यहाँ क्रोध नहीं, उत्साह है।
  3. "मुट्ठी भींची, होंठ चबाए, बोला, ले लूँगा प्रतिशोध।" उत्तर: रौद्र रस, क्योंकि प्रतिशोध की भावना और होंठ चबाना क्रोध के लक्षण हैं।

याद रखने की ट्रिक

"रौद्र में रोष, वीर में जोश।" रौद्र शब्द "रुद्र" से बना है, जिसका अर्थ है भयंकर और उग्र। क्रोध का विलोम क्षमा है; जहाँ क्षमा का उलटा, यानी बदले का भाव हो, वहाँ रौद्र रस देखें।

सामान्य गलतियाँ

  • स्थायी भाव "गुस्सा" या "रोष" नहीं, शास्त्रीय शब्द क्रोध लिखें।
  • युद्ध के हर वर्णन को रौद्र न मानें। उत्साह हो तो वीर, डर हो तो भयानक रस।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

रौद्र रस की परिभाषा क्या है?

शत्रु के अपमान, अन्याय या कठोर वचनों से हृदय में जागा क्रोध जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो रौद्र रस बनता है।

रौद्र रस का स्थायी भाव क्या है?

रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है। इसके अनुभाव हैं: आँखें लाल होना, दाँत पीसना, गरजना और हथियार उठाना।

रौद्र रस का प्रसिद्ध उदाहरण कौन सा है?

तुलसीदास की पंक्तियाँ "बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ मोहि बिलोकही॥" रौद्र रस का प्रसिद्ध उदाहरण हैं। यह कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक के संवाद प्रसंग से है।

रौद्र रस और वीर रस में क्या अंतर है?

रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है और इसमें बदले की भावना होती है। वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है और इसमें कर्तव्य, विजय या रक्षा का जोश होता है।

रौद्र रस की पहचान कैसे करें?

जहाँ आँखें लाल होना, भौंहें तनना, होंठ फड़कना, दाँत पीसना या गरजकर धमकी देना जैसे अनुभाव हों और कारण अपमान या अन्याय हो, वहाँ रौद्र रस समझें।