Bhrantiman alankar का अर्थ है भ्रांति यानी भ्रम से युक्त। जब कोई दो वस्तुओं की समानता के कारण धोखा खा जाता है और एक वस्तु को पक्के तौर पर दूसरी वस्तु समझ बैठता है, तब भ्रांतिमान अलंकार होता है। अँधेरे में रस्सी को साँप समझकर डर जाना इसका सबसे सरल उदाहरण है।
भ्रांतिमान अलंकार की परिभाषा
जहाँ रूप, रंग या गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का भ्रम हो जाए और उसी भ्रम के अनुसार कोई क्रिया भी हो जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। इसे भ्रम अलंकार भी कहते हैं। यह अलंकार के अर्थालंकार भेद में आता है।
भ्रांतिमान अलंकार की पहचान
- देखने वाले के मन में कोई दुविधा नहीं होती। वह गलत वस्तु को ही सच मान लेता है।
- भ्रम के बाद प्रायः कोई क्रिया होती है: डरकर भागना, चुगने लगना, पकड़ने दौड़ना।
- वाक्य में प्रायः "समझकर", "जानकर", "मानकर" या "भ्रम से" जैसे शब्द आते हैं। पुरानी कविता में "जानि" शब्द मिलता है।
भ्रांतिमान अलंकार के उदाहरण
Bhrantiman alankar ke udaharan अर्थ सहित नीचे दिए गए हैं।
- पाइ महावरु दैन कौं, नाइनि बैठी आइ। फिरि फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़ति जाइ॥ (बिहारी)
नाइन नायिका के पैरों में महावर लगाने बैठी है। एड़ी इतनी लाल है कि वह उसे महावर में भीगा कपड़ा (महावरी) समझकर बार बार एड़ी को ही मलती जाती है। यहाँ एड़ी में महावरी का भ्रम है। - उदाहरण: अँधेरे में पड़ी रस्सी को साँप समझकर दादी चीख पड़ीं। (स्वरचित उदाहरण)
रस्सी में साँप का भ्रम हुआ और चीखने की क्रिया हुई। - उदाहरण: चमकती काँच की गोलियों को बेर समझकर बंदर उन्हें मुँह में डालने लगा। (स्वरचित उदाहरण)
गोलियों में बेर का भ्रम है। - उदाहरण: लाल पलाश के फूलों को आग समझकर हिरन डरकर भाग गया। (स्वरचित उदाहरण)
लाल फूलों में आग का भ्रम है और भागने की क्रिया हुई। - उदाहरण: शीशे में दिखते नीले आकाश को खुला रास्ता समझकर चिड़िया उससे टकरा गई। (स्वरचित उदाहरण)
शीशे में आकाश का भ्रम है। - उदाहरण: घास पर चमकती ओस की बूँदों को मोती समझकर नन्ही बालिका उन्हें चुनने दौड़ी। (स्वरचित उदाहरण)
ओस में मोती का भ्रम है और चुनने की क्रिया हुई। - उदाहरण: धूप में चमकती रेत को पानी समझकर प्यासा हिरन उसकी ओर दौड़ पड़ा। (स्वरचित उदाहरण)
रेत में पानी का भ्रम है, इसी को मृगतृष्णा भी कहते हैं।
संदेह और भ्रांतिमान अलंकार में अंतर
ये दोनों अलंकार समानता के कारण होने वाली गड़बड़ी पर टिके हैं, इसलिए परीक्षा में इनका अंतर बार बार पूछा जाता है।
| आधार | संदेह अलंकार | भ्रांतिमान अलंकार |
|---|---|---|
| मन की दशा | दुविधा बनी रहती है: यह है या वह | मन पक्का हो जाता है, पर गलत वस्तु पर |
| निर्णय | कोई निर्णय नहीं होता | गलत निर्णय हो जाता है |
| क्रिया | प्रायः कोई क्रिया नहीं, केवल प्रश्न | भ्रम के अनुसार क्रिया भी हो जाती है |
| पहचान के शब्द | या, अथवा, कि, किधौं, कैधौं, कै | समझकर, जानकर, मानकर, भ्रम से |
| उदाहरण | यह रस्सी है या साँप? | रस्सी को साँप समझकर वह डरकर भाग गया। |
सरल नियम: प्रश्नवाचक दुविधा हो तो संदेह अलंकार, और पक्का भ्रम होकर कुछ कर बैठे तो भ्रांतिमान।
भ्रांतिमान, उपमा और उत्प्रेक्षा
उपमा में कवि जानता है कि दोनों वस्तुएँ अलग हैं, वह केवल समानता बताता है। उत्प्रेक्षा में कवि जानते हुए भी कल्पना करता है कि यह मानो वह है। भ्रांतिमान में पात्र सचमुच धोखा खा जाता है और उसे पता ही नहीं चलता कि वह गलत है।
| अलंकार | एक ही दृश्य |
|---|---|
| उपमा | ओस की बूँदें मोती सी चमक रही थीं। |
| उत्प्रेक्षा | ओस की बूँदें ऐसे चमकीं मानो मोती बिखरे हों। |
| संदेह | ये ओस की बूँदें हैं या मोती? |
| भ्रांतिमान | ओस की बूँदों को मोती समझकर बालिका उन्हें चुनने लगी। |
परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें
भ्रांतिमान का उत्तर लिखते समय तीन बातें लिखिए: किस वस्तु में किसका भ्रम हुआ, भ्रम का कारण क्या समानता थी, और भ्रम के बाद क्या क्रिया हुई। जैसे बिहारी के दोहे में लाल रंग की समानता के कारण एड़ी में महावरी का भ्रम हुआ और नाइन एड़ी मलती रही।
रोज़ के जीवन में भ्रांतिमान
हमारे साथ भी ऐसा होता है। दूर से किसी अनजान व्यक्ति को अपना मित्र समझकर हम हाथ हिला देते हैं, या नमक को चीनी समझकर चाय में डाल देते हैं। ऐसी घटनाओं को जब कविता में सुंदर ढंग से कहा जाता है, तब वहाँ भ्रांतिमान अलंकार बनता है। ध्यान रहे, कविता में भ्रम का कारण सुंदरता या गुण की बहुत गहरी समानता होनी चाहिए।
भ्रांतिमान के तीन कदम
- समानता: दो वस्तुओं में रंग, रूप या चमक की गहरी समानता होती है, जैसे लाल एड़ी और महावर।
- भ्रम: कोई पात्र एक वस्तु को दूसरी वस्तु पक्के तौर पर मान लेता है।
- क्रिया: उस भ्रम के आधार पर वह कुछ कर बैठता है, जैसे एड़ी मलना, डरकर भागना या चुगने लगना।
यदि तीनों कदम मिल जाएँ, तो भ्रांतिमान लिखने में कोई संदेह न रखें।
याद रखने की ट्रिक
"संदेह में सवाल, भ्रांति में बवाल।" संदेह में केवल प्रश्न रहता है, जबकि भ्रांतिमान में गलत समझकर कुछ कर बैठने से गड़बड़ हो जाती है।
सामान्य गलतियाँ
- "यह रस्सी है या साँप" को भ्रांतिमान लिखना। यहाँ दुविधा है, इसलिए संदेह है।
- कवि की अपनी कल्पना को भ्रांतिमान मानना। भ्रम किसी पात्र को सचमुच होना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भ्रांतिमान अलंकार किसे कहते हैं?
जहाँ अत्यधिक समानता के कारण एक वस्तु को भ्रम से दूसरी वस्तु समझ लिया जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। इसमें मन में दुविधा नहीं रहती, पक्का भ्रम हो जाता है। इसे भ्रम अलंकार भी कहते हैं।
भ्रांतिमान अलंकार का उदाहरण बताइए।
बिहारी का दोहा पाइ महावरु दैन कौं नाइनि बैठी आइ, फिरि फिरि जानि महावरी एड़ी मीड़ति जाइ प्रसिद्ध उदाहरण है। अँधेरे में रस्सी को साँप समझकर डर जाना इसका सबसे सरल उदाहरण है।
भ्रांतिमान अलंकार की पहचान क्या है?
भ्रांतिमान में कोई पात्र एक वस्तु को पक्के तौर पर दूसरी वस्तु समझ लेता है और उसी के अनुसार कुछ कर बैठता है। वाक्य में प्रायः समझकर, जानकर, मानकर जैसे शब्द आते हैं।
संदेह और भ्रांतिमान अलंकार में क्या अंतर है?
संदेह में मन दुविधा में रहता है कि यह वस्तु यह है या वह। भ्रांतिमान में मन गलत वस्तु को पक्का मान लेता है और उसी के अनुसार क्रिया भी हो जाती है।
भ्रांतिमान अलंकार शब्दालंकार है या अर्थालंकार?
भ्रांतिमान अर्थालंकार है, क्योंकि इसका चमत्कार अर्थ पर टिका है। शब्द बदल देने पर भी भ्रम का भाव बना रहता है।