Utpreksha alankar कल्पना का अलंकार है। उत्प्रेक्षा का अर्थ है ऊँची उड़ान वाली कल्पना। इसमें कवि कहता है कि यह वस्तु ऐसी लगती है मानो वह कुछ और हो। कवि पक्का नहीं कहता, केवल संभावना जताता है।
उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा
Utpreksha alankar ki paribhasha: जहाँ रूप, गुण या क्रिया की समानता के कारण उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। यह अलंकार के अर्थालंकार भेद में आता है।
उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान
उत्प्रेक्षा पहचानना सबसे आसान है, क्योंकि इसमें संभावना बताने वाले वाचक शब्द आते हैं:
| पुरानी कविता में | आज की हिंदी में |
|---|---|
| मनु, मनहुँ, मनो, जनु, जनहुँ, जानो | मानो, जैसे कि, लगता है, ऐसा प्रतीत होता है |
ध्यान दें: कभी कभी वाचक शब्द नहीं भी लिखा जाता, पर अर्थ से संभावना साफ झलकती है। ऐसी उत्प्रेक्षा को गम्योत्प्रेक्षा कहते हैं।
उत्प्रेक्षा अलंकार के भेद
| भेद | किसकी संभावना | उदाहरण |
|---|---|---|
| वस्तूत्प्रेक्षा | एक वस्तु में दूसरी वस्तु की | हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए |
| हेतूत्प्रेक्षा | जो कारण न हो उसे कारण मान लेना | झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए |
| फलोत्प्रेक्षा | जो फल न हो उसे फल मान लेना | उदाहरण: पेड़ झुककर खड़े हैं मानो राहगीर को छाया देने के लिए ही उगे हों। |
उत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण
Utpreksha alankar ke udaharan नीचे अर्थ सहित दिए गए हैं।
- उस काल मारे क्रोध के, तनु काँपने उनका लगा। मानो हवा के जोर से, सोता हुआ सागर जगा॥ (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ वध)
क्रोध से काँपते शरीर में तूफान से जागे सागर की संभावना मानो शब्द से की गई है। - कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए। हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए॥ (मैथिलीशरण गुप्त, जयद्रथ वध)
आँसू भरी आँखों में ओस से भरे नए कमलों की संभावना की गई है। - तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए॥ (भारतेंदु हरिश्चंद्र)
किनारे पर झुके पेड़ों के बारे में कल्पना है मानो वे जल को छूने के लिए झुके हों। यहाँ मनहुँ वाचक है। - उदाहरण: चाँदनी में झील ऐसे चमक रही थी, मानो धरती पर चाँदी बिछ गई हो। (स्वरचित उदाहरण)
झील में चाँदी की चादर की संभावना की गई है। - उदाहरण: बच्चा ऐसे दौड़ा, मानो उसके पैरों में पंख लग गए हों। (स्वरचित उदाहरण)
तेज दौड़ने में पंख लगने की कल्पना है। - उदाहरण: पके धान के खेत ऐसे लहराए, जनु सोने का सागर हिलोरें ले रहा हो। (स्वरचित उदाहरण)
सुनहरे खेतों में सोने के सागर की संभावना जनु शब्द से की गई है। - उदाहरण: लाल पलाश के फूल ऐसे दहक रहे थे, मानो जंगल में आग लगी हो। (स्वरचित उदाहरण)
लाल फूलों में आग की संभावना की गई है। - उदाहरण: उसके मुख पर ऐसी चमक थी, मानो सुबह का सूरज उग आया हो। (स्वरचित उदाहरण)
मुख की चमक में सूरज के उगने की कल्पना है। - उदाहरण: बादल ऐसे गरजे, जानो नगाड़े बज रहे हों। (स्वरचित उदाहरण)
बादलों की गर्जना में नगाड़ों की संभावना जानो शब्द से की गई है।
उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा में अंतर
| अलंकार | मूल भाव | वाचक शब्द | एक ही बात तीन ढंग से |
|---|---|---|---|
| उपमा | समानता (दोनों अलग, पर मिलते जुलते) | सा, सी, से, सम, समान, सरिस, जैसा | मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। |
| रूपक | अभेद (दोनों एक ही मान लिए गए) | कोई वाचक नहीं, कभी रूपी या योजक चिह्न | मुख चंद्रमा है। / मुख-चंद्र चमक रहा है। |
| उत्प्रेक्षा | संभावना (ऐसा लगता है मानो) | मनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ, जनहुँ | मुख मानो चंद्रमा है। |
उपमा में कवि कहता है "यह उसके जैसा है"। रूपक में कहता है "यह वही है"। उत्प्रेक्षा में कहता है "यह मानो वही है", यानी मन में संभावना है, पक्का दावा नहीं।
उत्प्रेक्षा और संदेह में अंतर
दोनों में मन पक्का नहीं होता, पर अंतर है। उत्प्रेक्षा में कवि को पता है कि वस्तु क्या है, वह केवल कल्पना करता है। संदेह अलंकार में देखने वाला सचमुच तय नहीं कर पाता कि वस्तु यह है या वह।
परीक्षा में उत्प्रेक्षा का उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा" में अलंकार बताइए।
आदर्श उत्तर: इसमें उत्प्रेक्षा अलंकार है। क्रोध से काँपते शरीर (उपमेय) में हवा के जोर से जागे सागर (उपमान) की संभावना की गई है। मानो वाचक शब्द है, जो संभावना बताता है। कवि यह नहीं कहता कि शरीर सागर है, वह केवल कल्पना करता है कि वह मानो जागा हुआ सागर हो।
उत्तर में "संभावना" शब्द और वाचक शब्द का नाम ज़रूर लिखिए। इसी से परीक्षक समझता है कि आप उत्प्रेक्षा और उपमा का अंतर जानते हैं।
उत्प्रेक्षा में अक्सर बात बढ़ा चढ़ाकर भी कही जाती है। यदि कल्पना असंभव की सीमा तक पहुँचे और मानो जैसा शब्द न हो, तो अतिशयोक्ति अलंकार की संभावना जाँचिए।
याद रखने की ट्रिक
"मनु, मानो, जनु, जानो, उत्प्रेक्षा पहचानो।" इन चार शब्दों को देखते ही उत्प्रेक्षा की संभावना सबसे पहले जाँचिए।
सामान्य गलतियाँ
- "ज्यों" को हमेशा उत्प्रेक्षा मानना। ज्यों केवल तुलना करे तो उपमा होती है, संभावना जताए तभी उत्प्रेक्षा।
- "मानो" देखकर बिना अर्थ देखे उत्तर लिखना। "मानो या न मानो" जैसे वाक्य में मानो का अर्थ स्वीकार करना है, वहाँ अलंकार नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
उत्प्रेक्षा अलंकार किसे कहते हैं?
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसमें मनु, मानो, जनु, जानो जैसे वाचक शब्द आते हैं। यह अर्थालंकार है।
उत्प्रेक्षा अलंकार के उदाहरण बताइए।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा, हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए, और झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए प्रसिद्ध उदाहरण हैं। बच्चा ऐसे दौड़ा मानो पैरों में पंख लग गए हों, यह सरल उदाहरण है।
उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान क्या है?
उत्प्रेक्षा की पहचान मनु, मनहुँ, मानो, जनु, जनहुँ, जानो जैसे वाचक शब्द हैं। आज की हिंदी में मानो, जैसे कि, लगता है जैसे शब्द भी यही काम करते हैं।
उत्प्रेक्षा अलंकार के कितने भेद हैं?
उत्प्रेक्षा के तीन भेद हैं: वस्तूत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा। वस्तु में वस्तु की, कारण में कारण की और फल में फल की संभावना की जाती है।
उपमा और उत्प्रेक्षा में क्या अंतर है?
उपमा में समानता बताई जाती है और सा, सी, सम, समान वाचक आते हैं। उत्प्रेक्षा में संभावना जताई जाती है और मनु, मानो, जनु, जानो वाचक आते हैं।