Shringar ras ka udaharan खोजने से पहले यह समझ लें कि श्रृंगार रस क्या है। जब किसी कविता में नायक और नायिका (प्रेमी और प्रेमिका) के आपसी प्रेम, उनके मिलन की खुशी या बिछड़ने की पीड़ा का वर्णन हो और पढ़ने वाले के मन में प्रेम का भाव जागे, तो वहाँ श्रृंगार रस होता है। श्रृंगार को रसराज (रसों का राजा) कहा जाता है। यह रस के ग्यारह प्रकारों में सबसे पहला और सबसे व्यापक रस है।
श्रृंगार रस की परिभाषा (Shringar ras ki paribhasha)
सहृदय के हृदय में स्थित रति नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर आस्वाद योग्य बन जाता है, तो उसे श्रृंगार रस कहते हैं।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव: रति (प्रेम)।
श्रृंगार रस के अंग
| अंग | श्रृंगार रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | रति |
| आलंबन | नायक और नायिका |
| उद्दीपन | चाँदनी रात, बसंत ऋतु, फूलों से भरा बाग, कोयल की कूक, सुंदर रूप |
| अनुभाव | मुसकराना, एकटक देखना, लजाना, आँखों से बातें करना, आँसू बहाना |
| संचारी भाव | लज्जा, हर्ष, उत्सुकता, स्मृति, चिंता, विषाद |
श्रृंगार रस के भेद
श्रृंगार रस के दो भेद हैं:
- संयोग श्रृंगार: जहाँ नायक नायिका के मिलन, साथ रहने, बातचीत और प्रेम क्रीड़ा का वर्णन हो।
- वियोग श्रृंगार (विप्रलंभ श्रृंगार): जहाँ प्रेमी के दूर चले जाने पर विरह की पीड़ा, याद और व्याकुलता का वर्णन हो।
श्रृंगार रस की पहचान कैसे करें
- पंक्ति में प्रेमी प्रेमिका, पिया, प्रियतम, सजनी, नैन, मिलन, विरह जैसे शब्द हों।
- मन में प्रेम, मीठी शरारत या विरह की कसक का भाव जागे।
- मिलन की खुशी हो तो संयोग, बिछड़ने का दुख हो तो वियोग श्रृंगार।
- ध्यान दें: प्रिय की मृत्यु पर शोक हो तो वह करुण रस है, वियोग श्रृंगार नहीं। वियोग में फिर मिलने की आशा बनी रहती है।
श्रृंगार रस के उदाहरण (Shringar ras ke udaharan)
उदाहरण 1: संयोग श्रृंगार (बिहारी)
कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सौं बात॥
व्याख्या: घर लोगों से भरा है, फिर भी नायक और नायिका आँखों ही आँखों में कहते हैं, मना करते हैं, रीझते हैं, खीजते हैं, मिलते हैं, खिल उठते हैं और लजाते हैं। यहाँ नायक नायिका आलंबन हैं, भरा हुआ भवन उद्दीपन है और आँखों से बातें करना, लजाना अनुभाव हैं। मिलन का वर्णन होने से संयोग श्रृंगार है।
उदाहरण 2: संयोग श्रृंगार (बिहारी)
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाइ॥
व्याख्या: बातों का आनंद लेने के लालच में गोपियों ने प्रियतम की मुरली छिपा दी है। वे कसम खाती हैं, भौंहों से हँसती हैं, देने को कहती हैं फिर मना कर देती हैं। मीठी छेड़छाड़ और हँसी से रति भाव पुष्ट होता है।
उदाहरण 3: वियोग श्रृंगार (जायसी)
पिउ सौं कहेहु सँदेसड़ा, हे भौंरा हे काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥
व्याख्या: पद्मावत की नागमती भौंरे और कौए से कहती है कि मेरे पिया से संदेश कहना कि तुम्हारी प्रिया विरह की आग में जलकर मर रही है और उसी के धुएँ से हम काले हो गए हैं। प्रिय के दूर होने की तड़प के कारण यह viyog shringar ras ka udaharan है।
उदाहरण 4: वियोग श्रृंगार (कबीर)
बिरहिनि ओदी लाकड़ी, सपचे और धुँधुआय।
छूटि पड़ौं या बिरह से, जो सिगरी जरि जाय॥
व्याख्या: विरहिणी गीली लकड़ी की तरह है, जो न पूरी जलती है न बुझती है, बस सुलगती और धुआँ देती है। वह चाहती है कि पूरी जल जाए तो विरह से छुटकारा मिले। विरह की व्याकुलता के कारण वियोग श्रृंगार है।
उदाहरण 5: संयोग श्रृंगार (मौलिक उदाहरण)
उदाहरण:
चाँदनी में बैठे दोनों, बातें करते रात ढली।
हँसती आँखें, झुकती पलकें, मन में जैसे कली खिली॥
व्याख्या: चाँदनी रात उद्दीपन है, हँसती आँखें और झुकती पलकें अनुभाव हैं, लज्जा और हर्ष संचारी भाव हैं।
उदाहरण 6: वियोग श्रृंगार (मौलिक उदाहरण)
उदाहरण:
सावन आया, बादल छाए, पर परदेसी नहीं आए।
राह निहारत नैन थके, हर आहट पर जी घबराए॥
व्याख्या: सावन और बादल विरह को बढ़ाते हैं (उद्दीपन)। राह देखना, आँखें थकना अनुभाव हैं, उत्सुकता और चिंता संचारी भाव हैं। प्रिय के लौटने की आशा है, इसलिए वियोग श्रृंगार है।
परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "कहत नटत रीझत खिझत" में कौन सा रस है? उत्तर: संयोग श्रृंगार रस। स्थायी भाव: रति। आलंबन: नायक और नायिका। उद्दीपन: भरा हुआ भवन, एक दूसरे की चेष्टाएँ। अनुभाव: रीझना, खीजना, लजाना, आँखों से बातें करना। संचारी भाव: लज्जा, हर्ष, उत्सुकता। इस क्रम में उत्तर लिखने से पूरे अंक मिलते हैं।
श्रृंगार रस मंडन के लेखक
परीक्षा में पूछा जाता है: श्रृंगार रस मंडन का लेखक कौन है? उत्तर है गोसाईं विट्ठलनाथ। यह ब्रजभाषा गद्य की आरंभिक रचनाओं में गिनी जाती है। कई विद्यार्थी इसे "श्रृंगार रस मंडल" भी लिख देते हैं, पर सही नाम "श्रृंगार रस मंडन" है।
याद रखने की ट्रिक
"मिले तो संयोग, बिछड़े तो वियोग, और प्रेम ही रति।" श्रृंगार का स्थायी भाव रति है, और रति का अर्थ प्रेम है। प्रेम के पर्यायवाची (स्नेह, अनुराग, प्रीति) दिखें, तो श्रृंगार रस की संभावना देखें।
सामान्य गलतियाँ
- माता का बच्चे से प्रेम श्रृंगार नहीं, वात्सल्य रस है।
- ईश्वर के प्रति प्रेम भक्ति रस है।
- प्रिय की मृत्यु का शोक करुण रस है, वियोग श्रृंगार नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्रृंगार रस की परिभाषा क्या है?
जहाँ नायक और नायिका के प्रेम, मिलन या विरह का वर्णन हो और रति स्थायी भाव पुष्ट होकर रस बने, वहाँ श्रृंगार रस होता है। इसे रसराज भी कहते हैं।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव क्या है?
श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति है। रति का अर्थ है प्रेम।
श्रृंगार रस के कितने भेद हैं?
श्रृंगार रस के दो भेद हैं: संयोग श्रृंगार और वियोग (विप्रलंभ) श्रृंगार। मिलन के वर्णन में संयोग और बिछड़ने की पीड़ा में वियोग श्रृंगार होता है।
वियोग श्रृंगार रस का उदाहरण क्या है?
जायसी का दोहा: "पिउ सौं कहेहु सँदेसड़ा, हे भौंरा हे काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥" इसमें नागमती प्रिय से दूर होने की पीड़ा बता रही है, इसलिए वियोग श्रृंगार है।
श्रृंगार रस मंडन का लेखक कौन है?
श्रृंगार रस मंडन के लेखक गोसाईं विट्ठलनाथ हैं। इसे ब्रजभाषा गद्य की आरंभिक रचनाओं में गिना जाता है।