Shant ras ka udaharan समझने के लिए कबीर के दोहे सबसे अच्छे हैं। जब किसी कविता में यह भाव हो कि शरीर, धन, मान, सब कुछ एक दिन मिट जाएगा, इसलिए मोह छोड़कर मन को शांत रखना चाहिए, तो पढ़ने वाले के मन में वैराग्य और गहरी शांति जागती है। वहीं शांत रस होता है। शांत रस रस के नौ मूल भेदों में नौवाँ है।
शांत रस की परिभाषा (Shant ras ki paribhasha)
तत्त्वज्ञान, संसार की क्षणभंगुरता और सांसारिक सुखों की असारता का बोध होने पर हृदय में निर्वेद (वैराग्य) नामक स्थायी भाव जागता है। यह निर्वेद जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो शांत रस कहलाता है।
शांत रस का स्थायी भाव है: निर्वेद। कुछ पुस्तकों में इसे शम भी लिखा गया है। स्कूली परीक्षा में निर्वेद सबसे अधिक मान्य उत्तर है।
शांत रस का इतिहास
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नाटक के आठ रस बताए गए थे। शांत रस को बाद के आचार्यों ने नौवें रस के रूप में मान्यता दी। उनका तर्क था कि मन का पूरी तरह शांत हो जाना भी एक गहरा अनुभव है। इसी से "नवरस" शब्द प्रचलित हुआ।
शांत रस के अंग
| अंग | शांत रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | निर्वेद |
| आलंबन | संसार की नश्वरता, परमात्मा का चिंतन, सत्य का ज्ञान |
| उद्दीपन | सत्संग, तीर्थ, एकांत, संतों के वचन, किसी की मृत्यु देखना, शास्त्रों का अध्ययन |
| अनुभाव | मोह छोड़ना, ध्यान लगाना, संसार से उदासीनता, आँखें मूँदना, शांत मुख |
| संचारी भाव | धृति, मति, स्मृति, हर्ष, निर्वेद, विबोध |
शांत रस की पहचान
- पंक्ति में जीवन, शरीर या धन के नश्वर होने की बात हो।
- मन, माया, मोह, जग, काया, माटी, बुलबुला जैसे शब्द आएँ।
- पढ़कर दुख नहीं, बल्कि गहरी शांति और समझ का भाव जागे।
- अहंकार छोड़ने, भीतर झाँकने और सच्चा मनुष्य बनने का संदेश हो।
शांत रस के उदाहरण (Shant ras ke udaharan)
उदाहरण 1: कबीर
माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥
व्याख्या: माला फेरते फेरते युग बीत गया, पर मन का भटकना नहीं रुका। कबीर कहते हैं, हाथ की माला छोड़ दो और मन के मनके को फेरो, अर्थात् मन को सुधारो। बाहरी दिखावे से हटकर मन की शांति की ओर ले जाने वाला यह दोहा शांत रस का उत्तम उदाहरण है। "मनका" शब्द दो अर्थों में आया है, इसलिए यहाँ यमक अलंकार भी है।
उदाहरण 2: कबीर
माटी कहै कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥
व्याख्या: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू मुझे रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे रौंदूँगी, अर्थात् तू भी मिट्टी में मिल जाएगा। शरीर की नश्वरता का बोध निर्वेद जगाता है।
उदाहरण 3: कबीर
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात॥
व्याख्या: मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा है। जैसे सुबह होते ही तारा छिप जाता है, वैसे ही यह जीवन भी देखते देखते मिट जाएगा। यहाँ उपमा अलंकार के सहारे जीवन की क्षणभंगुरता बताई गई है।
उदाहरण 4: कबीर (पद)
मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥
व्याख्या: हे मन, यह शरीर कागज़ का पुतला है, पानी की एक बूँद लगते ही क्षण भर में नष्ट हो जाता है। फिर इस पर इतना घमंड क्यों? अहंकार छोड़ने का संदेश शांत रस है।
उदाहरण 5: मौलिक उदाहरण
उदाहरण:
महल बने, फिर खंडहर हो गए, राजा सोए धूल।
फिर क्यों मन तू बाँधे गठरी, सब है एक दिन भूल॥
व्याख्या: खंडहर बने महल उद्दीपन हैं, संसार की नश्वरता आलंबन है। मोह की गठरी छोड़ने का भाव निर्वेद है।
उदाहरण 6: मौलिक उदाहरण (प्रकृति)
उदाहरण:
साँझ ढली, पंछी घर लौटे, शांत हुआ सब गाँव।
मन भी लौटे भीतर अपने, पाए सुख की छाँव॥
व्याख्या: शांत साँझ उद्दीपन है। मन का बाहर की भागदौड़ छोड़कर भीतर लौटना शांत रस का भाव है।
शांत रस, करुण रस और भक्ति रस में अंतर
| रस | स्थायी भाव | मन की दशा |
|---|---|---|
| शांत | निर्वेद | संसार से उदासीन, भीतर से शांत |
| करुण | शोक | किसी हानि पर रोता हुआ, व्याकुल |
| भक्ति | अनुराग (ईश्वर विषयक रति) | प्रभु के प्रेम में डूबा, समर्पित |
परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर" में कौन सा रस है? उत्तर: शांत रस। स्थायी भाव: निर्वेद। आलंबन: मन की चंचलता और दिखावटी भक्ति की व्यर्थता। उद्दीपन: युगों तक माला फेरने का निष्फल होना। अनुभाव: माला छोड़कर मन को सुधारने का उपदेश। संचारी भाव: मति, धृति।
अभ्यास: रस पहचानिए
- "धन दौलत सब यहीं रहेगा, साथ न जाए कोय।" उत्तर: शांत रस, क्योंकि धन की नश्वरता से वैराग्य जागता है।
- "बिछड़ गया बेटा सदा को, माँ रोए दिन रात।" उत्तर: करुण रस, क्योंकि यहाँ वैराग्य नहीं, शोक है।
- "नदी किनारे बैठ अकेला, मन हो गया अडोल।" उत्तर: शांत रस, क्योंकि मन की स्थिरता और शांति का भाव है।
याद रखने की ट्रिक
"नश्वर जग, निर्वेद मन, शांत रस।" तीनों में "न" की ध्वनि है। शांति का विलोम अशांति है; जहाँ मन की अशांति मिटाने की बात हो, वहाँ शांत रस खोजिए।
सामान्य गलतियाँ
- स्थायी भाव "शांति" नहीं, निर्वेद (या शम) लिखें।
- मृत्यु का हर वर्णन करुण नहीं होता। अगर मृत्यु देखकर वैराग्य जागे, तो शांत रस है।
- भरतमुनि ने नाटक के आठ रस गिनाए थे, नौ नहीं; शांत रस बाद में जुड़ा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शांत रस की परिभाषा क्या है?
संसार की नश्वरता और सांसारिक सुखों की असारता का ज्ञान होने पर मन में जागा निर्वेद जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होता है, तो शांत रस बनता है।
शांत रस का स्थायी भाव क्या है?
शांत रस का स्थायी भाव निर्वेद है। कुछ पुस्तकें इसे शम भी लिखती हैं, पर स्कूली परीक्षा में निर्वेद सबसे अधिक मान्य उत्तर है।
शांत रस का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण कौन सा है?
कबीर का दोहा "माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥" सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। इसमें दिखावे को छोड़कर मन सुधारने की सीख है।
शांत रस की पहचान कैसे करें?
जहाँ जीवन, शरीर और धन की नश्वरता, मोह माया छोड़ने और मन को शांत करने का भाव हो, वहाँ शांत रस समझें। पढ़कर दुख नहीं, गहरी शांति जागती है।
शांत रस को नौवाँ रस क्यों कहते हैं?
भरतमुनि ने नाटक के लिए आठ रस बताए थे। बाद के आचार्यों ने शांत रस को नौवें रस के रूप में जोड़ा, इसलिए इसे नौवाँ रस कहा जाता है।