Vibhats ras ka udaharan पढ़ते ही मन में घिन आती है और नाक सिकुड़ जाती है। जब किसी कविता में श्मशान, युद्धभूमि में पड़ी लाशें, सड़ा हुआ मांस, खून, पीब, गंदगी या कीड़ों का ऐसा वर्णन हो कि पढ़ने वाले के मन में घृणा जागे, तो वहाँ वीभत्स रस होता है। वीभत्स रस रस के नौ मूल भेदों में सातवाँ है। इसे कुछ लोग "विभत्स" भी लिखते हैं, पर शुद्ध वर्तनी वीभत्स है।
वीभत्स रस की परिभाषा (Vibhats ras ki paribhasha)
घृणित वस्तुओं, व्यक्तियों या दृश्यों को देखने, सुनने या उनका स्मरण करने से हृदय में स्थित जुगुप्सा नामक स्थायी भाव जागता है। यह जुगुप्सा जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होती है, तो वीभत्स रस की निष्पत्ति होती है।
वीभत्स रस का स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा)। जुगुप्सा का अर्थ है किसी चीज़ से इतनी अरुचि कि उसे देखने का भी मन न करे।
वीभत्स रस के अंग
| अंग | वीभत्स रस में |
|---|---|
| स्थायी भाव | जुगुप्सा |
| आलंबन | सड़ा मांस, लाशें, खून, हड्डियाँ, गंदगी, दुर्गंध वाली वस्तु |
| उद्दीपन | मांस नोचते गीध, कौए, सियार, कुत्ते, कीड़े, बदबू, मक्खियाँ |
| अनुभाव | नाक सिकोड़ना, मुँह फेरना, आँखें बंद करना, थूकना, उलटी जैसा मन होना |
| संचारी भाव | ग्लानि, आवेग, मोह, निर्वेद, व्याधि, शंका |
वीभत्स रस की पहचान
- पंक्ति में मांस, लहू, हड्डी, खोपड़ी, गीध, सियार, कीड़े, दुर्गंध, पीब जैसे शब्द हों।
- दृश्य डराने से अधिक घिन पैदा करे।
- पात्र या पाठक मुँह फेर लेना चाहे।
- प्रायः युद्ध के बाद की रणभूमि या श्मशान का वर्णन होता है।
वीभत्स रस के उदाहरण (Vibhats ras ke udaharan)
उदाहरण 1: भारतेंदु हरिश्चंद्र (सत्य हरिश्चंद्र नाटक)
सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत॥
गीध जाँघ को खोदि खोदि कै मांस उपारत।
स्वान आँगुरिन काटि काटि कै खात बिदारत॥
व्याख्या: श्मशान में पड़े शव के सिर पर बैठा कौआ उसकी दोनों आँखें निकालकर खा रहा है, सियार बड़े आनंद से जीभ खींच रहा है, गीध जाँघ खोद खोदकर मांस उखाड़ रहा है और कुत्ता उँगलियाँ काट काटकर खा रहा है। शव आलंबन है, मांस नोचते पशु पक्षी उद्दीपन हैं। पढ़ने वाले के मन में तीव्र घृणा जागती है। यह वीभत्स रस का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।
उदाहरण 2: भारतेंदु हरिश्चंद्र (उसी प्रसंग से)
बहु चील्ह नोचि लै जात तुच, मोद मढ्यो सबको हियो।
मनु ब्रह्मभोज जिजमान कोउ, आजु भिखारिन कहँ दियो॥
व्याख्या: बहुत सी चीलें शव की खाल नोचकर ले जा रही हैं और सबका मन खुशी से भरा है, मानो किसी यजमान ने आज भिखारियों को भोज दे दिया हो। घिनौने दृश्य की यह उत्प्रेक्षा जुगुप्सा को और गहरा करती है।
उदाहरण 3: मौलिक उदाहरण (रणभूमि)
उदाहरण:
रण बीता, पड़े कटे सिर, बहती लहू की धार।
गीध मँडराते, सियार खींचें, आँतों का अंबार॥
व्याख्या: कटे सिर और आँतें आलंबन हैं, मँडराते गीध और सियार उद्दीपन हैं। यहाँ युद्ध का उत्साह नहीं, उसके बाद का घिनौना दृश्य है, इसलिए वीभत्स रस है।
उदाहरण 4: मौलिक उदाहरण (कूड़े का ढेर)
उदाहरण:
सड़ा अन्न, भिनभिन मक्खी, बहता काला नाला।
नाक दबाकर निकला राही, मुँह पर कपड़ा डाला॥
व्याख्या: सड़ा अन्न और गंदा नाला आलंबन हैं, मक्खियाँ और दुर्गंध उद्दीपन हैं, नाक दबाना और मुँह ढकना अनुभाव हैं। यह छोटी कक्षाओं के लिए आसान vibhats ras ka udaharan है।
उदाहरण 5: मौलिक उदाहरण (घाव)
उदाहरण:
पीब भरा घाव पड़ा था, कीड़े रेंगें चार।
देख घिना गया सारा मेला, फेर लिया मुख यार॥
व्याख्या: पीब और कीड़े जुगुप्सा जगाते हैं, मुख फेर लेना अनुभाव है, ग्लानि संचारी भाव है।
वीभत्स रस और भयानक रस में अंतर
दोनों रसों में दृश्य अप्रिय होता है, पर भाव अलग होता है। भयानक रस में डर होता है और व्यक्ति अपनी जान बचाने के लिए भागता है। वीभत्स रस में घृणा होती है और व्यक्ति केवल मुँह फेर लेता है, उसे कोई खतरा नहीं होता। श्मशान का वर्णन अगर भूत के डर से हो तो भयानक, और सड़ते शव की गंदगी से हो तो वीभत्स।
| आधार | वीभत्स | भयानक |
|---|---|---|
| स्थायी भाव | जुगुप्सा | भय |
| मुख्य प्रतिक्रिया | घिन, मुँह फेरना | डर, भागना |
| सामान्य दृश्य | सड़ा मांस, गंदगी | शेर, आग, बाढ़ |
परीक्षा में उत्तर कैसे लिखें
प्रश्न: "सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत" में कौन सा रस है? उत्तर: वीभत्स रस। स्थायी भाव: जुगुप्सा। आलंबन: श्मशान में पड़ा शव। उद्दीपन: कौए, सियार, गीध और कुत्तों का मांस नोचना। अनुभाव: (पाठक या दर्शक का) मुँह फेरना। संचारी भाव: ग्लानि, निर्वेद।
अभ्यास: रस पहचानिए
- "सड़ी लाश पर मक्खी भिनकें, कौए नोचें मांस।" उत्तर: वीभत्स रस, क्योंकि सड़ी लाश और मांस नोचते कौए घृणा जगाते हैं।
- "श्मशान में आधी रात, सुनी किसी की चीख।" उत्तर: भयानक रस, क्योंकि यहाँ घृणा नहीं, डर है।
- "नाली में बहता कीचड़, उठती तीखी बास।" उत्तर: वीभत्स रस, क्योंकि गंदगी और दुर्गंध से घिन आती है।
याद रखने की ट्रिक
"घिन आए तो वीभत्स, डर आए तो भयानक।" स्थायी भाव का कठिन शब्द "जुगुप्सा" याद रखने के लिए सोचिए: "जुगुप्सा में जी घबराए, मुँह फिर जाए।" घृणा का विलोम प्रेम है, और प्रेम वाला रस श्रृंगार है।
सामान्य गलतियाँ
- वर्तनी "विभत्स" नहीं, वीभत्स लिखें।
- स्थायी भाव "घृणा" भी चलता है, पर शास्त्रीय उत्तर जुगुप्सा है।
- युद्ध का जोश वीर रस है; युद्ध के बाद की लाशों की गंदगी वीभत्स रस है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वीभत्स रस की परिभाषा क्या है?
घृणित वस्तुओं या दृश्यों को देखने, सुनने से हृदय में जागी जुगुप्सा जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होती है, तो वीभत्स रस बनता है।
वीभत्स रस का स्थायी भाव क्या है?
वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा है, जिसे सरल शब्दों में घृणा कहते हैं।
वीभत्स रस का प्रसिद्ध उदाहरण कौन सा है?
भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियाँ "सिर पर बैठ्यो काग, आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत॥" सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हैं। इनमें श्मशान में शव को नोचते पशु पक्षियों का वर्णन है।
वीभत्स रस के उदाहरण की पहचान कैसे करें?
जहाँ मांस, खून, हड्डी, गंदगी, दुर्गंध, कीड़े या मांस नोचते गीध सियार का वर्णन हो और मन में घिन आए, वहाँ वीभत्स रस समझें।
वीभत्स और भयानक रस में क्या अंतर है?
वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा है और इसमें व्यक्ति घिन से मुँह फेरता है। भयानक रस का स्थायी भाव भय है और इसमें व्यक्ति डरकर भागता या काँपता है।