Ras kise kahate hain: किसी कविता, कहानी या नाटक को पढ़ने, सुनने या देखने पर हमारे मन में जो आनंद या विशेष अनुभूति जागती है, उसे रस कहते हैं। रस का शाब्दिक अर्थ है निचोड़ या स्वाद। जैसे भोजन का स्वाद जीभ से मिलता है, वैसे ही काव्य का स्वाद मन से मिलता है। इसीलिए आचार्यों ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। कक्षा 9 और 10 के हिंदी व्याकरण में रस, अलंकार और छंद तीनों साथ पढ़ाए जाते हैं।
रस की परिभाषा (Ras ki paribhasha)
काव्य को पढ़ने या सुनने से अथवा नाटक को देखने से सहृदय पाठक या दर्शक के हृदय में जो अलौकिक आनंद उत्पन्न होता है, उसे रस कहते हैं।
रस का सबसे पुराना विवेचन आचार्य भरतमुनि के ग्रंथ नाट्यशास्त्र में मिलता है। उनका प्रसिद्ध रस सूत्र है: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"। इसका अर्थ है कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। आचार्य विश्वनाथ ने कहा: "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्", अर्थात् रस से युक्त वाक्य ही काव्य है।
सरल शब्दों में: जब कविता पढ़कर हमें हँसी आए, आँखें भर आएँ, जोश जागे या मन शांत हो जाए, तो समझिए कि कविता में रस है।
रस के अंग (Ras ke ang)
रस के कितने अंग होते हैं? रस के चार अंग (अवयव) होते हैं। इन्हीं चारों के मेल से रस बनता है।
- स्थायी भाव
- विभाव (आलंबन और उद्दीपन)
- अनुभाव
- संचारी भाव (व्यभिचारी भाव)
1. स्थायी भाव
मनुष्य के हृदय में जो भाव स्थायी रूप से, अर्थात् हमेशा सोई हुई अवस्था में रहते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। प्रेम, हँसी, दुख, क्रोध, उत्साह, डर जैसे भाव हर मनुष्य के मन में होते हैं। अनुकूल परिस्थिति मिलने पर यही स्थायी भाव जागकर रस का रूप ले लेता है। हर रस का एक स्थायी भाव होता है, इसलिए स्थायी भाव को रस का आधार कहा जाता है।
2. विभाव
जिन व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों के कारण मन का स्थायी भाव जागता है, उन्हें विभाव कहते हैं। विभाव के दो भेद हैं:
- आलंबन विभाव: जिसके सहारे भाव जागे। इसके दो पक्ष होते हैं: आश्रय (जिसके मन में भाव जागा) और विषय (जिसके कारण भाव जागा)। जैसे जंगल में शेर देखकर यात्री डर गया, तो यात्री आश्रय है और शेर विषय या आलंबन है।
- उद्दीपन विभाव: जो परिस्थितियाँ जागे हुए भाव को और तेज़ करें। जैसे शेर का दहाड़ना, सुनसान जंगल, अँधेरी रात। ये डर को और बढ़ा देते हैं।
3. अनुभाव
भाव जागने के बाद आश्रय के शरीर और व्यवहार में जो चेष्टाएँ दिखाई देती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं। जैसे डर से काँपना, पसीना आना, चीखना, भाग जाना। अनुभाव भाव के बाद आते हैं, इसलिए इनका नाम "अनु" (पीछे) भाव है। अनुभाव के चार भेद माने जाते हैं: कायिक (शरीर की चेष्टा), वाचिक (वाणी), आहार्य (वेशभूषा) और सात्त्विक। सात्त्विक अनुभाव आठ हैं: स्तंभ, स्वेद (पसीना), रोमांच, स्वरभंग, कंप, विवर्णता, अश्रु और प्रलय (बेहोशी)।
4. संचारी भाव
जो भाव मन में थोड़ी देर के लिए आते हैं, स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं और फिर चले जाते हैं, उन्हें संचारी या व्यभिचारी भाव कहते हैं। ये पानी के बुलबुलों की तरह उठते और मिटते हैं। संचारी भावों की संख्या 33 मानी गई है, जैसे: शंका, चिंता, स्मृति, लज्जा, हर्ष, विषाद, गर्व, मोह, आवेग, उत्सुकता, ग्लानि, निद्रा, त्रास। शेर वाले उदाहरण में "अब क्या होगा" की चिंता और घबराहट संचारी भाव हैं।
एक उदाहरण से चारों अंग समझिए
| अंग | उदाहरण: जंगल में शेर देखकर डरा यात्री |
|---|---|
| स्थायी भाव | भय |
| आश्रय | यात्री |
| आलंबन (विषय) | शेर |
| उद्दीपन | शेर की दहाड़, सुनसान जंगल |
| अनुभाव | काँपना, पसीना आना, भागना |
| संचारी भाव | चिंता, घबराहट (आवेग), त्रास |
| रस | भयानक रस |
रस के प्रकार (Ras ke prakar)
रस कितने प्रकार के होते हैं? भरतमुनि ने नाटक के लिए आठ रस बताए थे। बाद के आचार्यों ने शांत रस जोड़ा, जिससे काव्य में नौ रस माने गए। आगे चलकर वात्सल्य और भक्ति को भी अलग रस का दर्जा मिला। इस तरह आजकल की स्कूली पुस्तकों में प्रायः 11 रस पढ़ाए जाते हैं। कुछ पुस्तकें 9 और कुछ 10 रस भी लिखती हैं, इसलिए परीक्षा में अपनी पाठ्यपुस्तक की संख्या ही लिखें।
| क्रम | रस | स्थायी भाव | पहचान |
|---|---|---|---|
| 1 | श्रृंगार रस | रति (प्रेम) | नायक नायिका का प्रेम, मिलन या विरह |
| 2 | हास्य रस | हास | विचित्र वेश, बातें या हरकतें, हँसी |
| 3 | करुण रस | शोक | प्रिय का बिछड़ना या मृत्यु, रोना |
| 4 | रौद्र रस | क्रोध | अपमान या अन्याय पर गुस्सा |
| 5 | वीर रस | उत्साह | युद्ध, दान, दया या कर्तव्य का जोश |
| 6 | भयानक रस | भय | डरावना दृश्य, काँपना, भागना |
| 7 | वीभत्स रस | जुगुप्सा (घृणा) | गंदी, घिनौनी वस्तु या दृश्य |
| 8 | अद्भुत रस | विस्मय (आश्चर्य) | अनोखी, चकित करने वाली बात |
| 9 | शांत रस | निर्वेद (वैराग्य) | संसार की नश्वरता, मन की शांति |
| 10 | वात्सल्य रस | वत्सलता (संतान के प्रति स्नेह) | माता पिता का बच्चे से प्रेम |
| 11 | भक्ति रस | अनुराग (ईश्वर विषयक रति) | प्रभु के प्रति प्रेम और समर्पण |
रस के उदाहरण (Ras ke udaharan)
नीचे हर रस का एक छोटा उदाहरण दिया गया है। विस्तार के लिए हर रस के अलग पेज पर 4 से 6 उदाहरण दिए गए हैं।
- श्रृंगार रस: "कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात। भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सौं बात॥" (बिहारी)
- करुण रस: "सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥" (तुलसीदास)
- वीर रस: "सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु।" (तुलसीदास)
- शांत रस: "माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।" (कबीर)
- अद्भुत रस: "एक अचंभा देखा रे भाई। ठाढ़ा सिंह चरावै गाई॥" (कबीर)
- हास्य रस: "अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।" (भारतेंदु)
रस पहचानने का आसान तरीका
- पंक्ति पढ़कर सोचिए कि मन में कौन सा भाव जागा: प्रेम, हँसी, दुख, गुस्सा, जोश, डर, घिन, आश्चर्य या शांति।
- उस भाव का स्थायी भाव पहचानिए।
- तालिका से उस स्थायी भाव का रस बताइए।
- उत्तर में आश्रय, आलंबन और अनुभाव भी लिखें, तो पूरे अंक मिलते हैं।
याद रखने की ट्रिक
नौ रसों का क्रम याद रखने के लिए यह वाक्य दोहराइए: "श्री हा क रौ वी भ वी अ शां", अर्थात् श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शांत। फिर अंत में "वा भ" (वात्सल्य, भक्ति) जोड़ दीजिए। स्थायी भाव के लिए जोड़ियाँ बनाइए: प्रेम से श्रृंगार, हँसी से हास्य, शोक से करुण, क्रोध से रौद्र, उत्साह से वीर।
सामान्य गलतियाँ
- करुण रस का स्थायी भाव "दुख" नहीं, शोक लिखें।
- वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा है; भयानक का भय। दोनों को आपस में न मिलाएँ।
- रौद्र (क्रोध) और वीर (उत्साह) में अंतर रखें। वीर में जोश और कर्तव्य होता है, रौद्र में बदले की आग।
- श्रृंगार रस को "रसराज" कहा जाता है, क्योंकि इसमें सबसे अधिक संचारी भाव आ सकते हैं।
रस के बाद अनुप्रास अलंकार और दोहा छंद भी पढ़ें, क्योंकि परीक्षा में अक्सर एक ही पद्यांश से रस, अलंकार और छंद तीनों पूछे जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रस किसे कहते हैं?
काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से पाठक के मन में जो आनंद उत्पन्न होता है, उसे रस कहते हैं। रस को काव्य की आत्मा माना जाता है।
रस कितने प्रकार के होते हैं?
मूल रूप से रस नौ प्रकार के माने गए हैं: श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत। वात्सल्य और भक्ति को मिलाकर अधिकतर स्कूली पुस्तकें 11 रस बताती हैं।
रस के कितने अंग होते हैं?
रस के चार अंग होते हैं: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी (व्यभिचारी) भाव। विभाव के दो भेद हैं: आलंबन और उद्दीपन।
रस के कितने भेद होते हैं और रसराज किसे कहते हैं?
रस के नौ भेद मूल माने जाते हैं और वात्सल्य तथा भक्ति मिलाकर ग्यारह। श्रृंगार रस को रसराज कहा जाता है, क्योंकि यह सबसे व्यापक रस है।
संचारी भाव कितने होते हैं?
संचारी भाव 33 माने गए हैं, जैसे शंका, चिंता, लज्जा, हर्ष, विषाद, गर्व, स्मृति और आवेग। ये थोड़ी देर के लिए आकर स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं।